09 अक्टूबर 2020

पंचायत चुनाव की घंटी बजने से ग्राम प्रधानो की धड़कने बढी़ ,वोटरों को भी खुश करने के जतन शुरू

पंचायत चुनाव की  घंटी बजने से ग्राम प्रधानो की धड़कने बढी़ ,वोटरों को भी खुश करने के  जतन  शुरूगईं हैं। अपनी सीट बरकरार रखने के लिए हर जतन किए जा रहे हैं। वोटरों को भी खुश कर रहे हैं जो सबसे कठिन काम है।दावेदार प्रधानी की कुर्सी पाने के लिए हर जतन कर रहे हैं।उम्मीदवार सांझी रणनीति के तहत ऐसी योजना बनाने में जुटे हुए हैं, ताकि चुनाव में जीत भी जाएं और विरोधियों को भी करारा जवाब दिया जाए। उम्मीदवार मतदाताओं को ऐसे प्रलोभन में भी फंसाने का दांव खेल रहे हैं, ताकि काम भी बन जाए और मतदाता भी खुश रहे। पंचायत चुनाव में कुछ स्वार्थी तत्व जातिवाद का जहर घोल कर माहौल के समीकरण बिगाड़ने में जुट गए हैं।चुनाव की तिथियां भले ही न आई हो लेकिन पद के दावेदार गोटें बिछाने लगे हैं।  5 साल तक लोगों का हाल-चाल न लेने वाले अब प्रधान बनने की होड़ में लोगों का दुख दर्द पूछते देखे जा रहे हैं।पंचायत के विभिन्न पदों पर चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों ने भी अपनी जीत सुनिश्चित करने के लिए गोटियां फिट करनी शुरू कर दी हैं। सभी उम्मीदवार हर तरह से चुनावी रणनीति बनाकर अपने विरोधियों को पटखनी देने के लिए शतरंज की बिसात बिछाने में मशगूल हो गए हैं।

दूसरी तरफ गांव की दुर्दशा पर मतदाता अपने भाग्य को अभी भी पछता रहा है। ग्रामीण इस बार सोच समझकर मतदान करने के बाद कह रहे हैं। एक अक्टूबर से मतदाता सूची के पुनरीक्षण का कार्य शुरू हो चुका है हाईटेक बीएलओ एड्रायड मोबाइल के साथ घर घर जाएंगे। इसी के साथ प्रधान जी भी इस काम में लग जाएंगे कि किसी का वोट बनने से न रह जाए।ग्राम पंचायतों का कार्यकाल 26 दिसम्बर को पूरा हो रहा है। आयोग ने मतदाता सूची के पुनरीक्षण का कार्यक्रम घोषित किया है।ऐसे में वोटरों को अपने साथ रखना एक बड़ी चुनौती है। यह बात प्रधानों को परेशान कर रही है। जैसे चुनाव का समय नजदीक आ रहा है । यह चुनौती और भी बढ़ती चली जा रही है। पहले यह लग रहा था कि शायद चुनाव अप्रैल या मई में होंगे और उस समय तक परिस्थितियां बदल जाएंगी लेकिन ऐसा नहीं हुआ। जिस तेजी से काम शुरु किया गया है।  उसके चलते चुनाव तो जनवरी में होते दिखाई दे रहे हैं। इससे प्रधानों की धड़कने बढ़ाने के लिए काफी हैं।

पंचायत सदस्यों व ग्राम पंचायत के प्रधानों ने कार्यकाल तो पूरा कर लिया है। लेकिन गांवों की दुर्दशा ज्यों की त्यों हैं। शासन ने ग्राम विकास में जहां करोड़ों रुपया ग्राम पंचायतों को दिए। पैसा तो खर्च हो गया परंतु रास्ते ज्यों के त्यों बने रहे। सदस्यों व प्रधानों ने लोगों की समस्या पर कम अपने विकास पर ज्यादा ध्यान दिया गया।कई गांव ऐसे हैं।जहां आज भी लोगों का निकला मुश्किल है। 

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