07 अक्टूबर 2020

ग्रामीण जीवन की निर्भरता ही भारत की वास्तविक आत्मनिर्भरता होगी

 


आखिर गांव की दशा सुधार कर ही देश की दशा में सुधार संभव है  ।    

ग्रामीण जीवन की निर्भरता ही भारत की वास्तविक आत्मनिर्भरता होगीदेश की अर्थव्यवस्था कोरोना  के कारण  धरातल में पहुंच चुकी है  भारत के प्रधानमंत्री मोदी जी ने आत्मनिर्भर भारत का सपना दिखाया है लेकिन आपने भर भारत कैसे बनेगा महामारी काल में यह साबित हो गया है कि अपने ही संसाधन संकट के समय काम आते हैं। ग्रामीण जीवन बद से बदतर होता गया सरकार को आखिर ग्रामीण संसाधनों याद आ ही गई जो कोरोना के कहर से अप्रभावित रहे हैं। ग्रामवासियों के रहन-सहन का तरीका बेहतर साबित हुआ है। सभी ग्रामवासियों का मिल-जुल कर एक परिवार की भांति रहना और एक-दूसरे को यथासंभव सहयोग करने हेतु सदैव तत्पर रहना हमारे ग्रामीण जीवन की विशेषता है। दरअसल, शहरी जरूरतों का भी सारा सामान गांव से ही आता हैं। वह वहीं पैदा होता है। इसलिए एक बार फिर लोगों का ध्यान गांवों की ओर गया है। प्राचीन काल से ही हमारे देश की अर्थव्यवस्था का प्रमुख आधार कृषि ही रहा है। कृषि पर हमारी निर्भरता के साथ ही यह तथ्य भी हमारे लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण है कि देश की पैंसठ प्रतिशत से भी अधिक जनसंख्या गांवों में ही निवास करती है।महात्मा गांधी ने देश में जिस स्वराज्य की परिकल्पना की थी, उसकी बुनियाद देश के लाखों गांवों के विकास पर टिकी है। उनका दृढ़ विश्वास था कि जब तक भारत के लाखों गांव स्वतंत्र, शक्तिशाली और स्वावलंबी बन कर उसके संपूर्ण जीवन में पूरा भाग नहीं लेते, तब तक भारत का भविष्य उज्जवल नहीं हो सकता। इसमें कोई संदेह नहीं कि ग्राम स्वराज्य की यह पद्धति आर्यों के शासन व्यवस्था की बुनियाद थी। इस बारे में 1830 में अंग्रेज गवर्नर जनरल सर चार्ल्स मेटकाफ ने जो ब्योरा अपने देश को भेजा था, उसमें लिखा था- ह्यभारत के ग्राम समुदाय एक प्रकार के छोटे-छोटे गणराज्य हैं, जो अपने लिए आवश्यक सभी सामग्री की व्यवस्था कर लेते हैं और किसी प्रकार के बाहरी संपर्क से मुक्त हैं। लगता है कि इनके अधिकारों और प्रबंधों पर कभी कोई प्रभाव नहीं पड़ता। एक के बाद एक राजवंश आता है, क्रांतियों का क्रम चलता रहता है। किंतु ग्राम समुदाय उसी ढर्रे पर चलता जाता है। मेरे विचार से ग्राम समुदायों के इस संघ ने जिसमें प्रत्येक (समुदाय) एक छोटे-मोटे राज्य के ही रूप में हैं, अन्य किसी बात की अपेक्षा अनेक क्रांतियों के बावजूद भारतीय जन समाज को कायम रखने और जनजीवन को विश्रृंखल होने से बचाने में बड़ा भारी काम किया। साथ ही, यह जनता को सुखी बनाए रखने और उसे स्वतंत्र स्थिति का उपभोग कराने का बड़ा भारी साधन है। इसलिए मेरी इच्छा है कि गांवों की इस व्यवस्था में कभी उलट फेर न किया जाए। मैं उस प्रवृत्ति की बात सुन कर ही दहल जाता हूं जो इनकी व्यवस्था भंग करने की सलाह देती है।

मेटकाफ के इस खौफ के बावजूद ब्रिटिश सरकार स्वतंत्रता और आत्मनिर्भरता के इन केंद्रों को विनष्ट करने की निर्धारित नीति पर बराबर चलती रही। इन ग्राम-गणतंत्रों को विनष्ट कर ब्रिटिश साम्राज्यशाही ने इस प्राचीन देश को सबसे अधिक क्षति पहुंचाई।  गांधी जी ने भी ग्रामीण जीवन के विकास की संकल्पना को सी आगे बढ़ाने का कार्य किया था लेकिन ब्रिटिश विचारधारा के मार्ग पर आगे चलते हुए गांव को भूल गए और  शहरों के विकास को देखने के कारण देश के गांवों की दशा बिगड़ती गई औरगरीबी बढ़ती रही। कम से कम तीस फीसद जनता आज भी गरीबी की रेखा के नीचे जी रही है। बेकारी भी बढ़ी है। शिक्षितों की बेकारी भी बढ़ी है। साथ-साथ विषमता भी कम होने के बदले बढ़ ही रही है। इसीलिए अब सबका ध्यान फिर से गांधी जी के विचारों की ओर जाने लगा है। मौजूदा वैश्विक महामारी संकट के बाद उच्च वर्ग के भी बहुत से विद्वानों को ऐसा महसूस होने लगा है कि गांधीजी के दिखाए रास्ते को छोड़ कर भारत ने बहुत बड़ी गलती की है। अत: ये सब लोग भी गांधी जी की विचारधारा से मिलता-जुलता विचार रखने लगे हैं। जैसे, कृषि विकास हमारी विकास योजना का मुख्य आधार बनना चाहिए। इसकी बुनियाद पर ही गृह उद्योगों और ग्रामोद्योग की एक रूपरेखा गांवों के विकास के लिए बनानी चाहिए। उसमें बिजली, परिवहन और बाजार आदि की सुविधाएं भी उपलब्ध कराई जाएं। बड़े उद्योगों की उपेक्षा करने की बात नहीं है, परंतु अपने जैसे देश में जहां पूंजी की बहुत कमी हो और मानव शक्ति बडे़ पैमाने पर बेकार पड़ी हो और देश की अधिकांश आबादी गांवों में बसती हो, वहां योजना की बुनियाद ही बदलनी चाहिए।

हालांकि हाल के वर्षों में गांवों की सूरत बदली है। सरकारों ने गांव और किसानों की ओर थोड़ा तो ध्यान दिया है। दूर-दराज के गांवों में भी बिजली-पानी पहुंचाने का काम कुछ तो परवान चढ़ा है। दूरदर्शन व अन्य संचार माध्यमों के द्वारा ग्रामीण लोगों को उत्तम कृषि, स्वास्थ्य व शिक्षा संबंधी जानकारी दी जा रही है। गांवों को सड़क और रेलमार्गों द्वारा शहरों से जोड़ने का काम जारी है। कृषि क्षेत्र के प्रस्तावित तीन कानूनी सुधारों से गांवों की दुनिया बदल सकती है। इन तीनों सुधारों को ठीक ढंग से लागू कर दिया गया तो एक देश एक बाजार का सपना साकार हो जाएगा। सरकार ने आवश्यक वस्तु अधिनियम में संशोधन, एपीएमसी एक्ट और एग्रीकल्चर प्रोड्यूस प्राइस एंड क्वालिटी एश्योरेंस जैसे तीन बड़े सुधारों को हरी झंडी देकर अन्नदाता की सुध ली है।

अर्थव्यवस्था में सुधार के लिए पिछले महीने केंद्र सरकार ने जो आर्थिक पैकेज घोषित किया गया है उसमें कृषि क्षेत्र के साथ पशुपालन, डेयरी, मत्स्य, खाद्य प्रसंस्करण, जड़ी-बूटी, शहद उत्पादन और आपरेशन ग्रीन की कमजोर कड़ियों को मजबूत करने पर जोर दिया गया है। राहत पैकेज में कृषि क्षेत्र के लिए लगभग 1.65 लाख करोड़ रुपए के पैकेज की घोषणा की गई है। निश्चित आमदनी के लिए जोखिम रहित खेती में मानक युक्त गुणवत्ता वाली फसल उगाने के लिए जो उपाय किये जाएंगे, उसमें किसानों के हितों का पूरा ध्यान रखा जाएगा। इसमें किसानों से निर्यातक और बड़े खरीददार सीधे जुड़ेंगे। हमारे यहां लोकतंत्र के मूलभूत तत्व को समझा नहीं गया है और इसीलिए हम समझते हैं कि सब कुछ सरकार कर देगी, हमारी कोई जिम्मेदारी नहीं है। जनता को अपनी समस्याओं का हल स्वयं अपने हाथों से निकालना होगा। सरकार उनकी मदद कर सकती है, किन्तु पहल जनता को ही करनी होगी, तभी हम आगे बढ़ पाएंगे।

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