पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की जयंती है। उनका जन्म 25 दिसंबर 1924 को ग्वालियर में हुआ था। वह तीन बार भारत के प्रधानमंत्री बने थे। साल 1996 में वे पहली बार भारत के प्रधानमंत्री बने थे, हालांकि इस दौरान उनका कार्यकाल काफी छोटा यानी 13 दिनों का था। इसके बाद उनका दूसरा कार्यकाल 13 महीने का था और फिर 1999 में जब वह पीएम बने तो उन्होंने 2004 तक पांच साल का अपना कार्यकाल किया। अटल बिहारी वाजपेयी राजनेता बनने से पहले एक पत्रकार थे। वह देश-समाज के लिए कुछ करने की प्रेरणा से पत्रकारिता में आए थे। अटल बिहारी राजनीति में कैसे आए, इसके पीछे एक प्रेरणादायक कहानी है।
एक स्कूल टीचर के घर में पैदा हुए अटल बिहारी वाजपेयी के लिए जीवन का शुरुआती सफर आसान नहीं था। 25 दिसंबर 1924 को ग्वालियर के एक निम्न मध्यमवर्ग परिवार में जन्मे वाजपेयी की प्रारंभिक शिक्षा-दीक्षा ग्वालियर के ही विक्टोरिया (अब लक्ष्मीबाई) कॉलेज और कानपुर के डीएवी कॉलेज में हुई थी। उन्होंने राजनीतिक विज्ञान में स्नातकोत्तर किया और पत्रकारिता में अपना करियर शुरू किया। उन्होंने राष्ट्रधर्म, पांचजन्य और वीर अर्जुन जैसे अखबारों-पत्रिकाओं का संपादन किया।
वे बचपन से ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़ गए थे और इस संगठन की विचारधारा (राष्ट्रवाद या दक्षिणपंथ) के असर से ही उनमें देश के प्रति कुछ करने, सामाजिक कार्य करने की भावना मजबूत हुई। इसके लिए उन्हें पत्रकारिता एक बेहतर रास्ता समझ में आया और वे पत्रकार बन गए। उनके पत्रकार से राजनेता बनने का जो जीवन में मोड़ आया, वह एक महत्वपूर्ण घटना से जुड़ा है।बलरामपुर की धरती से भारतीय राजनीति के पुरुष अटल बिहारी वाजपेयी की पहली जीत का जश्न भी यादगार था.पूर्व प्रधानमंत्री भारतरत्न अटल बिहारी वाजपेयी और बलरामपुर का पुराना नाता रहा है. आज भी बलरामपुर की स्मृतियों में अटल की स्पष्ट छाप दिखाई देती है. बलरामपुर वह धरती है, जिसने अटल बिहारी वाजपेयी को पहली बार संसद में भेजने का गौरव हासिल किया है. सन् 1957 में अटल बलरामपुर लोकसभा से चुनाव जीतकर संसद पहुंचे थे. 1957 में उन्होंने कांग्रेस के बैरिस्टर हैदर हुसैन को हराया था. हालांकि 1962 का चुनाव वो कांग्रेस की सुभद्रा जोशी से 200 मतों से हार गए थे लेकिन 1967 में अटल ने कांग्रेस की सुभद्रा जोशी को हराकर विजय प्राप्त की थी. इसके बाद अटल जी 15 वर्षो तक बलरामपुर की सक्रिय राजनीति में कायम रहे.अटल बिहारी वाजपेयी 1957 में पहली बार लोकसभा का चुनाव लड़ने के लिए रेलगाड़ी से यहां पहुंचे थे. जनसंघ पार्टी की ओर से उन्हे एक धक्का प्लेट जीप मिली थी. अटल जी के पुराने सहयोगी और अपनी उम्र का लगभग शतक पूरा कर चुके देवता प्रसाद मिश्र बताते हैं कि हम लोगों की पार्टी गरीब थी और साधन नहीं थे. उसी एक जीप पर पहले धक्का लगाते थे फिर उसी से प्रचार करने के लिए जाते थे. तमाम कार्यकर्ता बैलगाड़ियों और साइकिलो से गांव-गांव प्रचार करने निकलते थे.
बलरामपुर की धरती से भारतीय राजनीति के शलाका पुरुष अटल बिहारी वाजपेयी की पहली जीत का जश्न भी यादगार था. अटलजी के पुराने सहयोगी केवल प्रसाद ने जीत के जश्न की यादें बताते हुये भावुक हो गए. केवल प्रसाद अटल जी के साथ चलने वाली टोली के मुखिया होते थे. 1957 की जीत के बाद जगह-जगह जो गेट सजाये गये थे, वो गेट गिलास, लोटे और गगरियों से बनाये गये थे. अटल जी की टोली नारे लगाते हुये शहर और गांव की गलियों में जीत का जश्न मना रही थी.
बलरामपुर के एक खपरैल के मकान से शुरू हुआ अटल जी का राजनैतिक सफर प्रधानमंत्री आवास तक पहुँचा. 1957 में पहली बार लोकसभा का चुनाव लड़ने बलरामपुर पहुंचे अटल जी एक खपरैल की कोठरी में रहते थे. शहर से 5 किलोमीटर दूर खगईजोत गांव में लाटबख्श सिंह के पुश्तैनी मकान के खपरैल की कोठरी में अटल जी रहा करते थे. बरामदे में अटल जी की चौपाल लगा करती थी. वह तख्त भी मौजूद है जिस पर अटल जी सोते थे और वह लकडी की बेन्च भी है जिस पर अटल जी से मिलने आने वाले लोग बैठा करते थे. 1957 से लेकर 1970 तक अटल जी जब भी बलरामपुर में होते रात इसी कोठरी में बिताते थे. खपरैल की यह कोठरी आज भी अटलजी की तमाम स्मृतियों को सहेजे हुये हैअटल जी को कबड्डी खेलने का बहुत शौक था. 1957 में पहली बार बलरामपुर चुनाव लड़ने पहुंचे अटल जी के पास नौजवानों की एक टोली बन गई थी. राजनीति से समय मिलने पर हास-परिहास और खेलों का दौर शुरू होता था. इसी टोली के एक सदस्य और अटल जी के पुराने सहयोगी मंगल लोहिया उन दिनो की यादें साझा करते हुये बताते हैं कि अटल जी खूब कबड्डी खेला करते थे.शरीर से बलिष्ठ मंगल लोहिया अटल जी की विपक्षी टीम का हिस्सा बनते थे. 90 साल की अवस्था पूरी कर चुके मंगल लोहिया बताते है कि रमना पार्क में कबड्डी होती थी. खेल के दौरान कई बार वह दौर आया, जब अटल जी कबड्डी पढ़ते हुये आये और मंगल लोहिया ने उन्हे पकड लिया और अटल जी को कहना पडा कि हार गये भाई हार गये. इसके बाद अटल जी अपनी कविताओ के माध्यम से अपने साथी नौजवानो में जोश भरते थे.
अटल जी के साथ ही गैसड़ी विधानसभा क्षेत्र से जनसंघ के विधायक रहे सुखदेव प्रसाद अटल जी को याद कर भावुक हो जाते हैं. पूर्व विधायक सुखदेव प्रसाद बताते हैं कि खुद संयमित भाषा का प्रयोग करते थे और अपने कार्यकर्ताओं को भी संयम का पाठ पढाते थे. प्रचार से लौटने के बाद अटलजी कार्यकर्ताओं की क्लास लेते थे और लोगो से संवाद स्थापित करने के गुर सिखाया करते थे.


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