यह उन पाँच (प्रक्षेपास्त्र) मिसाइल प्रणालियों में से एक है जो भारत के रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन द्वारा एकीकृत निर्देशित मिसाइल विकास कार्यक्रम के तहत विकसित की गई है। इस प्रक्षेपास्त्र का विकास ₹300 करोड़ (US$43.8 मिलियन) की लागत से किया गया है। इसकी मारक क्षमता 4 कि०मी० है।
इसका प्रथम सफल परीक्षण नवम्बर 1990 में किया गया। इसे 'दागो और भूल जाओ' टैंक रोधी प्रक्षेपास्त्र भी कहा जाता है क्योंकि एक बार इसे दागे जाने के बाद पुनः निर्देशित कराने की आवश्यकता नहीं पड़ती।
18 जुलाई 2019 को डीआरडीओ ने नाग एंटी टैंक गाइडेड मिसाइल का पोखरण में फायरिंग रेंज राजस्थान में सफल परीक्षण किया।
कई खूबियों के अलावा इसमें इंफ्रारेड भी है, जो लॉन्च से पहले टारगेट को लॉक करता है। इसके बाद नाग अचानक ऊपर उठती है और फिर तेजी से टारगेट के एंगल पर मुड़कर उसकी ओर चल देती है। लक्ष्य भेदने की इसकी क्षमता काफी सटीक है। बता दें कि इससे पहले भी नाग मिसाइल के कई अन्य ट्रायल हो चुके हैं। हर बात कुछ नया इसमें जोड़ा जाता रहा है। साल 2017, 2018 और 2019 में अलग-अलग तरीके की नाग मिसाइलों का परीक्षण हो चुका है। ये वजन में काफी हल्की होती है, लेकिन इसके बावजूद दुश्मन के टैंक समेत अन्य सैन्य वाहनों को सेकेंडों में समाप्त कर सकती है।बता दें कि इन दिनों पूर्वी लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा पर चीन की सेना डटी हुई है। ऐसे में नाग मिसाइल का सफल परीक्षण भारत के लिए अच्छे संकेत हैं। सीमा पार जारी तनाव के बीच इन मिसाइलों का परीक्षण खासा अहम माना जा रहा है। हाल ही में डीआरडीओ प्रमुख ने कहा कि संस्थान सेना के लिए स्वदेशी मिसाइलों को तैयार में जुटा हुआ है, ताकि मिसाइल क्षेत्र में भारत को आत्मनिर्भर बनाया जा सके।भारत और चीन के बीच सीमा पर जारी तनाव के दौरान मिसाइल परीक्षण में भारत एक और कदम आगे बढ़ गया है। भारत ने गुरुवार को वारहेड के साथ 'नाग' एंटी टैंक गाइडेड मिसाइल के अंतिम चरण का सफलतापूर्वक परीक्षण किया। मिसाइल का परीक्षण सुबह 6:45 बजे राजस्थान के पोखरण फील्ड फायरिंग रेंज में किया गया। नाग मिसाइल को रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) ने विकसित किया है।

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