भारतीय संस्कृति में पर्यावरण जीवन में साकार करें ,यदि पर्यावरण बचाना है तो हर व्यक्ति को जागरूक बनना होगा
भारतीय संस्कृति में पर्यावरण को विशेष महत्त्व दिया गया है। प्राचीन काल से ही भारत में पर्यावरण के विविध स्वरूपों को “देवताओं” के समकक्ष मानकर उनकी पूजा अर्चना की जाती है। पृथ्वी को तो “माता” का दर्जा दिया गया है। “माता भूमिरू पुत्रो अहं पृथिव्या” अर्थात पृथ्वी हमारी माता है एवं हम सभी देशवासी इस धरा की संतान हैं। इसी प्रकार पर्यावरण के अनेक अन्य घटकों यथा पीपल, तुलसी, वट के वृक्षों को पवित्र मानकर पूजा जाता है। अग्नि, जल एवं वायु को भी देवता मानकर उन्हें पूजा जाता है। समुद्र, नदी को भी पूजन करने योग्य माना गया है। गंगा, यमुना, कावेरी, गोदावरी, सिंधु एवं सरस्वती आदि नदियों को पवित्र मानकर पूजा जाता है। हमें, हमारे पूर्वजों द्वारा पशु एवं पक्षियों का भी आदर करना सिखाया जाता है। इसी क्रम में गाय को भी माता कहा जाता है।हमारे चारों ओर दिखाई देने वाले वातावरण को भौतिक पर्यावरण कहते हैं। यह कई बार बहुत मनोहारी दृश्यों, मंदिरों के भवनों एवं इसके आस पास के हरियाली भरे वातावरण के माध्यम से हमारे सामने रहता है। यह हरियाली भरा वातावरण एवं मंदिर के विशाल भवनों की अनूठी कला इतनी मनमोहक रहती है कि हम लोग उन्हें बार बार देखने के लिए लालायित हो उठते हैं एवं ऐसे स्थान पर्यटन के केंद्र के रूप में उभर कर सामने आ जाते हैं। जैसे भारत में केदारनाथ, बद्रीनाथ, वैष्णोदेवी, हरिद्वार, काशी, अयोध्या, कन्याकुमारी, मीनाक्षी मंदिर, तिरुपति बालाजी, जगननाथ पुरी, आदि। प्राचीन काल में ऐसे केंद्रो को विकसित करने में भारतीय बहुत रुचि लेते थे और भौतिक पर्यावरण को उच्च श्रेणी का बनाए रखकर अन्य स्थानों से लोगों को आकर्षित करते थे।
कोविड-19 संक्रमण के समय प्रकृति ने बताया ऑक्सीजन कितनी बहुमूल्य है-
आज आदमी ने भौतिक विकास में सबसे ज्यादा नुकसान प्रकृति व पर्यावरण का हुआ है और यह बात सारी दुनिया पर लागू होती है । करीब -करीब हर देश में ही प्रकृति को हो रहे नुकसान व अनचाहे असंतुलन पर विचार विनिमय व चिंतन मनन भी जारी है ।आज एक तरफ ‘पर्यावरण बचाओ’ का नारा दिया जा रहा है ,तो दूसरी तरफ प्राकृतिक संसाधनों का अतिशय दोहन भी जारी है । अब यह नारा यह कितना सार्थक रह गया है यह भी छिपा नहीं है।
वातावरण में लगातार घटता ऑक्सीजन व जीवनदायिनी गैसों का स्तर व बढ़ती जहरीली गैसें मानव जीवन को चुनौती दे रहीं हैं । अपने स्वार्थों के चलते पर्यावरण व प्रकृति दोनों ही आज संकट में हैं । व्यवसायिक उद्देश्य से प्राकृतिक संसाधनों का अंधाधुंध दोहन पृथ्वी पर मानव व दूसरे जीव जंतुओं का जीवन को संकट में डालरहे हैं और कोविड-19 संक्रमण के इस दौर में जब शरीर में ऑक्सीजन की मात्रा घटने की वजह से भारी संख्या में मौतें भी हो रही हैं तब समझ में आता है कि प्रकृति में असीमित मात्रा में मौजूद ऑक्सीजन कितनी बहुमूल्य है।
लगातार बढ़ता हुआ तकनीकी का प्रयोग , तेज रफ्तार जीवन , भौतिक संसाधनों को असीमित की सीमा तक बढ़ाने की होड़ ने यदि जीवन में किसी चीज को सबसे ज्यादा उपेक्षित किया है तो वह है जीवन में प्रकृति का महत्व व हमारे चारों ओर का पर्यावरण । परिवहन, संचार, विज्ञान आदि के नाम पर होते अति अनाचार, लगातार होता प्राकृतिक संसाधनों का दोहन, वृक्षों का कटान, अंधाधुंध बढ़ती जनसंख्या , लगातार धरती को ढकती पक्की सड़कों व चारों तरफ उगते कंक्रीट के जंगलों आदि ने पृथ्वी की श्वसन-क्रिया तक को ठप्प कर दिया है । मानव जीवन असाध्य बीमारियों से जूझ रहा है इस तरह तकनीकी ने भी एक अच्छे व सुकूनभरे के मानव जीवन के लिए खतरे की घंटी बजा दी है अतः अब हमें पर्यावरण के अनुकूल तकनीकी की तलाश करनी होगी।
आज प्राचीन संस्कृति , परंपरा व विचारों को पूरी तरह से भुला बैठे हैं । तुलसी पूजा , पीपल पूजा , वटवृक्ष की पूजा आदि के माध्यम से पेड़ पौधों का संरक्षण तो होता ही था इनकी संख्या में वृद्धि का दरवाजा भी खुल जाता था । हिन्दू धर्म में ऐसे अनेक अवसर रहते थे जिनमें बिना वृक्षों की पूजा के शुभ कार्य सम्पन्न ही नहीं होते थे और यही वजह थी कि हवन व पूजन के समय अन्य देवी देवताओं के साथ साथ वृक्ष देवता का स्मरण भी अपरिहार्य होता था । पर , समय के साथ आये बदलाव ने हमारे जीवन से पेड़ पौधों को अलग करके उनकी जगह मानव निर्मित उन सुविधाओं को दे दी जो पर्यावरण के प्रति तनिक भी संवेदनशील नहीं हैं । इसके विपरीत इन्होने वातावरण का को प्रदूषित किया है ।
पर्यावरण संरक्षण पर जोर
पर्यावरण प्रदूषण के कारणों पर जब एक नजर डालते हैं तो एक ओर जहां उसके लिए हम स्वयं ही जिम्मेदार हैं वहीं तेजी से बढ़ता औद्योगिकरण, बढ़ती हुई जनसंख्या, रासायनिक पदार्थों का अतिशय प्रयोग ,रेड़ियोधर्मी विकीरण , पराबैंगनी किरणों का वायुमंडल में प्रवेश, ओजोन परत का क्षय,‘एसिड़ रेन’, वाहनों से निकलता धुआं, फैक्ट्रियों के अपशिष्ट, हवा में जहरीली गैसों का सम्मिश्रण, आणविक रिएक्टरों की बढ़ती संख्या, लगातार बढ़ते मोबाईल फोेन , नोन बायोडिग्रेडेबल उत्पाद , रोक के बावजूद प्लास्टिक तथा पोलिथिन का बढ़ता प्रयोग आदि न जाने कितने ही जाने अनजाने कारण मौजूद हैं , जो स्वयं मानव ने ही तैयार किए हैं । मगर जब बात आती है समाधान की तो आमजन सरकार पर और सरकार एक्सपर्ट पर निर्भर हो जाते हैं , न आम आदमी अपना दायित्व निभाने को तैयार है और न ही सरकार । यदि पर्यावरण बचाना है तो हर व्यक्ति को जागरूक बनना होगा
शहरों ही नहीं गांवों तक में भी अब शुद्ध व ताजी हवा व साफ-सुथरा पीने योग्य पानी मिलने दूभर हो गये हैं ,शहरों में लगातार बढ़ते जल ,वायु व क्लोरो फ्लोरो कार्बन आदि से वहां का जीवन तो पूरी तरह से नारकीय हो गया है । वहां के वायु मंडल में सी एफ सी गैसो का उत्सर्जन बढ़ रहा है , वायुमंडल में कार्बनडाई ऑक्साईड, कार्बन मोनोऑक्साईड, मिथेन ,नाइट्रोजन , धुआं ,धूल व वाहनों से निकला हुआ पैट्रोल तथा डीजल मिश्रित उत्सर्जन लगातार बढ़ता जा रहा है , सांस लेना व पानी पीना तक अब खतरनाक से ज्यादा की श्रेणी में आ गया है ,ऐसे में हमें शुद्ध हवा पानी एवं पर्यावरण संरक्षण पर जोर देना होगा।
यदि पर्यावरण संरक्षण की शुरुआत फेसबुक व सोशल मीडिया में ही नहीं अपने जीवन में साकार करें। वैसे इसके लिए कुछ बहुत ज्यादा करना भी नहीें है बस संकल्प के साथ सब लोग एक-एक पौधा रोप कर उसकी देखभाल करें, हरे वृक्ष न काटें ओर न ही काटने दें, पशु , पक्षियों व जीव जंतुओं का ख्याल रखें क्योंकि ये हमारे पर्यावरण के सबसे बड़े शुभेच्छु हैं , कछुए, मछली, सुअर, बाज ,गिद्ध, चील, आदि वातावरण को लगातार साफ करने वाले जीवों में से हैं । स्वयं भी वाहन के प्रयोग में ‘पूल’ सिस्टम का प्रयोग करें, ऑटोमोबाईल्स की जगह साईकिल या पैदल या सार्वजनिक वाहन का प्रयोग करें प्लास्टिक के प्रयोग को कम से कम कर दें ,खरीददारी के समय घर से थैला लेकर जाएं ,पाॅलिथिन को स्वेच्छा से ‘न’ कहना सीखें ।
, कागज का उपयोग खत्म या बहुत कम कर दें तो पर्यावरण का बहुत भला होगा । याद रखिए, पर्यावरण की रक्षा केवल कहने , दिखाने या परोपदेश मात्र से नहीं होने वाली है उसके लिए हर एक को अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत करना होगा ।


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